सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 201 : मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई

 ग़ज़ल 201
122---122--122---122

मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई
न क़ैद-ए-कफ़स ही, न होगी रिहाई

भरोसा नहीं जब मेरी बात का तो
कहाँ तक तुम्हें दूँ मैं अपनी सफ़ाई

ये मासूम दिल था, समझ कुछ न पाया
इशारों में जो बात तुम ने बताई

नज़र को मेरी वैसी ताक़त भी देते
अगर तुम को करनी थी जल्वानुमाई

कहीं ज़िक्र आया न मेरा अभी तक
कहानी अधूरी है तुमने सुनाई

हज़ारों शिकायत तुम्हे ज़िन्दगी से
कभी ज़िन्दगी से की क्या आशनाई ?

सुना है कि शामिल वो हर शय में ’आनन’
वो ख़ुशबू है, ख़ूशबू  न देती दिखाई

-आनन्द.पाठक-

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