क़िस्त 122/क़िस्त 9
जनता को क्या अनपढ़ समझा
लम्बी लम्बी फेंक रहे हो
जलता है घर और किसी का
अपनी रोटी सेंक रहे हो
सुख दुख जीवन के दो पहलू
बारी बारी आना जाना
आजीवन कब दोनों रहते
क्या हँसना क्या नीर बहाना
सबके अपने अपने मसले
सब की अपनी है मजबूरी
साथ निभानेवाला कोई-
हमराही है एक ज़रूरी
मीठी मीठी चिकनी चुपड़ी
समझ रहा हूँ बातें सारी
देख रहा हूँ पट के पीछे
शहद घुली है घात कटारी
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