अनुभूतियाँ 117/04
क़िस्त 117/क़िस्त 4
465
अगर तुम्हे लगता हो ऐसा
साथ छोड़ना ही अच्छा है
जिसमे खुशी तुम्हारी होगी
मुझे तुम्हारा दिल रखना है
466
जा ही रहे हो लेते जाना
टूटा दिल यह, सपने सारे
क्या करना अब उन वादों का
तड़पाएँगे साँझ-सकारे ।
467
जहाँ रहो तुम ख़ुश रहना तुम
खुल कर जीना हाँसते गाते
अगर कभी कुछ वक़्त मिले तो
मिलते रहना आते-जाते
468
छोड़ गई तुम ख़ुशी तुम्हारी
लेकिन याद तुम्हारी बाक़ी
तुम्हें मुबारक नई ज़िंदगी
मुझको रहने दो एकाकी
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