माहिए: क़िस्त 18 ओके1क्यों मन से हारा है ,कब मिलता सब कोहर बार किनारा है ? 2इक दर्द उभरता है, ख़्वाब-ओ-ख़यालों मेंवो जब भी उतरता है। 3कल मेरे बयां
होंगे,मैं न रहूँ शायद,पर मेरे निशां
होंगे। 4आए वो नहीं अबतक,ढूँढ रहीं आँखें,हर शाम ढलूँ
कबतक ? 5 महकी ये हवाएँ
हैं,उनके आने कीशायद ये सदाएँ हैं।-आनन्द.पाठक-इन्ही माहियों के सुनें कवयित्री डा0 अर्चना पाण्डेय ’अर्चना’ की आवाज़ में
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