बुधवार, 8 नवंबर 2023

ग़ज़ल 344 [20F] : मैं दूर जा के भी उसको---

 ग़ज़ल 344 [20F]

1212---1122---1212---112


मैं दूर जा के भी उसको कभी भुला न सका
करीब था तो कभी हाल-ए-दिल सुना न सका

तमाम उम्र इसी  इन्तिज़ार में गुज़री,
गया था कह के, मगर लौट कर वो आ न सका ।

हर एक दौर में थीं साज़िशें मिटाने की
करम ख़ुदा का था कोई हमें मिटा न सका ।

ख़याल-ए-ख़ाम थे अकसर जगे रहे मुझमें
मैं चाह कर भी नज़र आप से मिला न सका ।

बना के ख़ाक से फिर ख़ाक में मिलाए क्यों
ये खेल आप का मुझको समझ में आ न सका

जिधर है दैर-ओ-हरम, है उधर ही मयख़ाना
किधर की राह सही है कोई बता न सका ।

तेरी तलाश में ’आनन’ कहाँ कहाँ न गया 
मुक़ाम क्या था? कहाँ था ? कभी मैं पा न सका ।


-आनन्द.पाठक--


 सं 28-06-24

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