गीत 082 [01] : सरस्वती वंदना
जयति जयति माँ वीणापाणी ,मन झंकृत कर दे, माँ भारती वर दे !
तेरे द्वारे खड़ा अकिंचन. भक्ति भाव से है पुष्पित मन,‘ सुर ना जानू, राग न जानू और न जानू पूजन अर्चन !कल्मष मन में घना अँधेरा. ज्योतिर्मय कर दे,माँ भारती वर दे !
छन्द छन्द माँ तुझे समर्पित, राग ताल से हो अभिसिंचित जब भी तेरे गीत सुनाऊँ , शब्द शब्द हो जाएँ हर्षित ।अटक न जाए कहीं रागिनी, स्वर प्रवाह भर दे ।माँ भारती वर दे !
’सत्यम शिवम सुन्दरम ’-लेखन,बन जाए जन-मन का दरपन गूँगों की आवाज़ बने माँ, क़लम हमारी करे नव-सॄजन ।शक्ति स्वरूपा बने लेखनी, शक्ति पुंज भर दे ।माँ भारती वर दे !
मैं अनपढ़ माँ, अग्यानी मन, हाथ जोड़ कर, करता आवाहन, गीत ग़ज़ल के अक्षर अक्षर तेरे हैं माँ तुझको अर्पन !चरण कमल में शीश झुकाऊँ, भक्ति प्रखर कर दे।माँ भारती वर दे !
-आनन्द.पाठक-इस वंदना को मेरे स्वर में सुनें
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