मंगलवार, 4 जून 2024

ग़ज़ल 387[51F] : आश्रमॊं में धुंध का वातावरण है-

 

ग़ज़ल 387 [51F]

2122---2122---2122


आश्रमों में धुंध का वातावरण है
बंद आँखें फिर भी कहते जागरण है ।

आदमी अंदर ही अंदर खोखला है
खोखली श्रद्धा का ऊपर आवरण है ।

और को उपदेश देते त्याग माया 
कर न पाते मोह का ख़ुद संवरण है ।

लोग अंधी दौड़ में शामिल हुए अब 
चेतना का क्या नया यह अवतरण है ।

भीड़ में हम भेड़ -सा हाँके गए हैं
यह निजी संवेदना का अपहरण है ।

ख़ुद से आगे और कुछ दिखता न उनकॊ
स्वार्थ का कैसा भयंकर आचरण है ।

रोशनी स्वीकार वो करते न ’आनन’
इन अँधेरों का अलग ही व्याकरण है ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24


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