एक ग़ज़ल 46: रोशनी से कब तलक....
2122--2122---2122
रोशनी से कब तलक डरते रहोगे ?
’तालिबानी’ इल्म में पलते रहोगे
यूँ किसी के हाथ का बन कर खिलौना
कब तलक उन्माद में लड़ते रहोगे ?
तुम ज़मीर-ए-ख़ास को मरने न देना
गाहे-गाहे सच की तो सुनते रहोगे
प्यार के दो-चार पल जी लो,वगरना
नफ़रतों की आग में जलते रहोगे
जानता हूँ ’रोटियों’ के नाम लेकर
तुम सियासी चाल ही चलते रहोगे
मैं सदाकत के लिए लड़ता रहूँगा
और तुम ! दम झूट का भरते रहोगे
जब कभी फ़ुर्सत मिले,’आनन’ से मिलना
मिल जो लोगे ,बारहां मिलते रहोगे
-आनन्द.पाठक
09413395592
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सोमवार, 22 जुलाई 2013
एक ग़ज़ल 46 : रोशनी से कब तलक....
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