मंगलवार, 9 अगस्त 2022

ग़ज़ल 246 [11E] : दर्द दिल में जगा के रखते हैं

 ग़ज़ल 246 [11E]


2122---1212---22


दर्द-दिल में जगा के रखते हैं
राज़ अपना छुपा  के रखते हैं

इश्क़ में कुछ ग़लत न कर बैठे
दिल को समझाबुझा के रखते हैं

जो मिला आप की इनायत है
रंज़-ओ-ग़म भी सजा के रखते हैं

लोग ऐसे भी हैं ज़माने में
जाल अपना बिछा के रखते हैं

तीरगी में भटक न जाएँ, वो
लौ दिए की बढ़ा  के रखते हैं

जब नज़र आते नक़्श-ए-पा उनके
सामने सर झुका के रखते हैं

अक्स है आप ही का जब ’आनन’
फ़ासिला क्यों बना के रखते हैं ?


-आनन्द.पाठक-


तीरगी में = अन्धकार में /अँधेरे में

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