गुरुवार, 11 अगस्त 2022

ग़ज़ल 249 [14E] : आप को राज़-ए-दिल बताना क्या

 ग़ज़ल 249 [14E]


2122---1212---22


आप को राज़-ए-दिल बताना क्या !
उड़ते बादल का है ठिकाना  क्या !

बेरुखी आप की अदा ठहरी
मर गया कौन ये भी जाना क्या !

बारहा मैं सुना चुका तुम को
फिर वही हाल-ए-दिल सुनाना क्या !

लोग कहते हैं सब पता तुम को
हसरत-ए-दिल का फिर छुपाना क्या !

जानता हूँ तुम्हें नहीं आना-
रोज़ करना नया बहाना  क्या !

रोशनी ही बची न आँखों में
रुख से पर्दे का फिर उठाना क्या !

इश्क़ की आग दिल में लग ही गई
जलने दो , अब इसे बुझाना क्या !

जो भी कहना है खुल के कह ’आनन’
बेसबब बात को घुमाना क्या !


-आनन्द.पाठक-

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