मंगलवार, 24 सितंबर 2024

ग़ज़ल 423 [72-फ़] : मुख़ालिफ़ जो चलने लगी हैं हवाएँ

 ग़ज़ल  423 [72-फ़]

122---122---122---122


मुख़ालिफ़ जो चलने लगी हैं हवाएँ
चिराग़-ए-मुहब्बत कहाँ हम जलाएँ ।

बला आसमानी से क्या ख़ौफ़ खाना
अगर साथ होंगी तुम्हारी दुआएँ ।

बदल जाएगी मेरी दुनिया यक़ीनन
मेरी ज़िंदगी में अगर आप आएँ ।

मिलेगा ठिकाना कहाँ और हमको
जहाँ जा के सजदे में यह सर झुकाएँ।

सभी अपने ग़म में गिरफ़्तार बैठे
यह जख़्म-ए-जिगर जा के किसको दिखाएँ ?

परिंदे शजर छोड़ कर उड़ गए हैं 
शजर कैसे अपनी जमीं छोड़ जाएँ ।

तुम्ही को ये दुनिया बनानी है ’आनन’
फ़रिश्ते उतर कर जो आएँ न आएँ ।


-आनन्द.पाठक-






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