अनुभूतियाँ : क़िस्त 023 ओके
89
चाँद जो लौटा घर को अपने,
एक झलक पाने की ख़ातिर
रोज़ा रखा माह भर हमने ।
इतनी दूर आ गए हम तुम
लौट के अब जाना नामुमकिन
और कहाँ तक साथ चलोगी
प्रश्न वही है अब भी लेकिन।
91
हाथ न रख्खो इन कंधों पर
आँसू हैं इनको बहने दो,
मैने इनको पाल रखा है
दर्द हमारे संग रहने दो ।
92
होली का मौसम आया है,
’फ़गुनहटा’ आँचल सरकाए,
मादक हुई हवाएँ, प्रियतम !
-आनन्द पाठक ’आनन’-
880092 7181
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