गुरुवार, 8 सितंबर 2022

ग़ज़ल 261[26 E] : इश्क़ तो दिल का ठिकाना ढूँढता है--

 ग़ज़ल 261 [26 E]
2122---2122---2122

इश्क तो दिल का ठिकाना ढूँढता है
रास्ता यह सूफियाना ढूँढता है

झूठ को जब सच बता कर बेचना हो
आदमी क्या क्या बहाना ढूँढता  है 

हादिसा क्या रह गया बाक़ी कोई अब ?
क्यों मेरा ही  आशियाना ढूँढता  है ?

लौट कर आता नहीं बचपन किसी का
क्यों अबस फिर दिन पुराना ढूँढता  है 

रोशनी अब तक नहीं उतरी जो दिल मे
फिर क्यों मौसम आशिक़ाना ढूँढता  है 

जिस फ़साने में जहाँ हो ज़िक्र उनका
दिल हमेशा वह फ़साना ढूँढता  है 

जब कभी बेचैन होता दिल ये ’आनन’
आप ही का आस्ताना ढूँढता  है 

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
मसाइल = मसले, समस्यायें
आस्ताना = ड्योढ़ी ,चौखट ,दर

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