गुरुवार, 30 मई 2024

ग़ज़ल 383(47F): जाल में ख़ुद ही फ़ँसा है आदमी

 ग़ज़ल 383 [47F]

2122---2122---212


जाल में ख़ुद ही फ़ँसा है आदमी
किस तरह उलझा हुआ है आदमी

ज़िंदगी भर द्वंद में जीता रहा-
अपने अंदर जो बसा है आदमी ।

सभ्यता की दोड़ में आगे रहा
आदमीयत खो दिया है आदमी

ज़िंदगी की सुबह में सूली चढ़ा
शाम में उतरा किया है आदमी ।

देखता है ख़ुद हक़ीक़त सामने
बन्द आँखें कर रखा है आदमी ।

पैर चादर से सदा आगे रही
उम्र भर सिकुड़ा किया है आदमी।

चाह जीने की है ’आनन’ जब तलक
मर के भी ज़िंदा रहा है आदमी ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24


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