बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अनुभूतियाँ 185/72

 अनुभूतियाँ 185/72

737
 ऐसे भी कुछ लोग यहाँ है ,
धन के मद में , सदा अहम में ।
व्यर्थ दिखावा करते रहते ,
जीते रहते एक भरम में ।

738
सिर्फ़ दिखावा, झूठी आभा
ज़हर घुला मधुरिम बानी में
समझ रहे हैं हम भी कुछ कुछ
क्या तुम हो, कितने पानी में ।

739
तुमने देखी होगी दुनिया
 मैने भी है  दुनिया देखी
सत्य हमेशा सच रहता है
भले बघारो जितना शेखी

740
अपने ही मुँह मिठ्ठू बनना
आत्म मुग्धता में ही रहना
पता नहीं है शायद तुमको
कूएँ से बाहर भी दुनिया ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

कोई टिप्पणी नहीं: