अनुभूतियाँ 185/72
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ऐसे भी कुछ लोग यहाँ है ,
धन के मद में , सदा अहम में ।
व्यर्थ दिखावा करते रहते ,
जीते रहते एक भरम में ।
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सिर्फ़ दिखावा, झूठी आभा
ज़हर घुला मधुरिम बानी में
समझ रहे हैं हम भी कुछ कुछ
क्या तुम हो, कितने पानी में ।
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तुमने देखी होगी दुनिया
मैने भी है दुनिया देखी
सत्य हमेशा सच रहता है
भले बघारो जितना शेखी
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अपने ही मुँह मिठ्ठू बनना
आत्म मुग्धता में ही रहना
पता नहीं है शायद तुमको
कूएँ से बाहर भी दुनिया ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
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