सोमवार, 8 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 452[26-G] : भरोसा तोड़ कर वह

 ग़ज़ल 452 : भरोसा तोड़ कर

1222---1222---1222


भरोसा तोड़ कर वह मुस्कराता है

कि जैसे दिल पे वह ख़ंज़र चलाता है ।


नहीं रहता वो अपने क़ौल पर क़ायम

किसी को कुछ, किसी को कुछ बताता है।


न जाने सोचता रहता वो क्या हरदम

हवा में बारहा लिखता मिटाता है ।


मुहब्बत का नशा उसको चढ़ा ऐसा

वो अपने आप को ही भूल जाता है ।


न लौटेंगे गए जो छोड़ कर तुझको

तो फिर उम्मीद क्या उनसे लगाता है ।


परिंदे लौट कर अब फिर न आएँगे

इसी ग़म में शजर फिर टूट जाता है ।


असर होना नहीं जब उस पे कुछ ’आनन’

अबस तू जख़्म अपना क्यों दिखाता है ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’-


अबस = व्यर्थ



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