ग़ज़ल 452 : भरोसा तोड़ कर
1222---1222---1222
भरोसा तोड़ कर वह मुस्कराता है
कि जैसे दिल पे वह ख़ंज़र चलाता है ।
नहीं रहता वो अपने क़ौल पर क़ायम
किसी को कुछ, किसी को कुछ बताता है।
न जाने सोचता रहता वो क्या हरदम
हवा में बारहा लिखता मिटाता है ।
मुहब्बत का नशा उसको चढ़ा ऐसा
वो अपने आप को ही भूल जाता है ।
न लौटेंगे गए जो छोड़ कर तुझको
तो फिर उम्मीद क्या उनसे लगाता है ।
परिंदे लौट कर अब फिर न आएँगे
इसी ग़म में शजर फिर टूट जाता है ।
असर होना नहीं जब उस पे कुछ ’आनन’
अबस तू जख़्म अपना क्यों दिखाता है ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
अबस = व्यर्थ
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