ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी-
1222---1222---1222---1222
हज़ारों बार बातें हो चुकीं, क्या उनको दुहराना ।
मसाइल हो चुके जो हल उन्हे क्यों फिर से उलझाना ।
तुम्हें शौक़-ए-अदावत है , मुझे शौक़-ए-मुहब्बत है
वफ़ा भी चीज कोई है , कभी तुमने नहीं माना ।
निगाहें क्या झुकीं पलभर, लबों पर क्या हुई ज़ुम्बिश
ये दुनिया भर की सरगोशी बना देती है अफ़साना ।
तुम्हारा मुंतज़िर हूँ मैं, तुम्हारी रहगुज़र में हूँ
ख़याल-ओ-ख़्वाब में तुम हो, नहीं बच कर निकल जाना ।
पस-ए-पर्दा रहोगे तुम पहेली बन के यूँ कबतक
इधर बेचैन हैं आँखे ,ज़रा तुम सामने आना ।
सिफ़त क्या है मुहब्बत की, नहीं मालूम क्या तुमको ?
चले इस राह पर जब हो, नहीं अब लौट कर जाना ।
हवाओं के मुक़ाबिल तुम जलाते हो चिराग़ ’आनन’
बहुत मुशकिल हुआ करता चिराग़ों को बचा पाना ।
-आनन्द पाठक ’आनन’-
मसाइल = मसले, समस्यायें
मुंतज़िर = प्रतीक्षक
पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे
सिफ़त = विशेष गुण
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