अनुभूतियाँ 187/74
:745:
छ्द्म आवरण ओढ़े ओढ़ कर
सभी दिखावे में व्याकुल हैं
जान रहे हैं वो भी ख़ुद को
जान रहे हैं वो भी ख़ुद को
मिथ्या भावों के संकुल हैं ।
:746:
उनकी आदत वही पुरानी
बिना बात के टाँग अड़ाना
राई को परबत बतलाना
बेमतलब का शोर मचाना ।
बिना बात के टाँग अड़ाना
राई को परबत बतलाना
बेमतलब का शोर मचाना ।
747
आजीवन चलते रहना है
रूकना कोई कर्म नहीं है
प्राणी का उत्पीड़न करना
यह तो कोई धर्म नहीं है
748
बात अभी क्या तुमसे करना
अभी नशे में डूबे हो तुम ।
दीन धरम तुम क्या समझोगे
धन दौलत के भूखे हो तुम ।
-आनन्द पाठक 'आनन'
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