-कविता 014
कई अजनबी चेहरे उभरे
भोले भाले
कुछ दिलवाले
चार क़दम चल कर,
कुछ ठहरे
कुछ अन्तस में
गहरे उतरे ।
साया बन कर साथ रहे
हाथों में उनके हाथ रहे
अन्धकार जब उतरा ग़म का
छोड़ गए, मुँह मोड़ गए कुछ
वो छाया थे।
फिर वही जीवन एकाकी
आगे अभी सफ़र है बाक़ी
लोग यहाँ पर मिलते रहते
जुड़ते और बिछड़ते रहते
क्या रोना है
क्यों रोना है
जीवन है तो यह होना है ।
-आनन्द. पाठक ’आनन’-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें