शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल 62 : ऐसे समा गये हो...

221----2122  // 221---2122
मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊलु-- फ़ाइलातुन // मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन
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ऐसे समा गये हो ,जानम मेरी नज़र में
तुम को ही ढूँढता हूँ ,हर शै में ,हर बशर में

इस दिल के आईने में इक अक्स जब से उभरा
फिर  बाद उसके कोई ठहरा नहीं नज़र में

पर्दा तो तेरे रुख पर देखा सभी ने लेकिन
देखा तुझे नुमायां ख़ुरशीद में ,क़मर में

जल्वा तेरा नुमायां हर सू जो मैने देखा
शम्स-ओ-क़मर में, गुल में, मर्जान में, गुहर में

वादे पे तेरे ज़ालिम हम ऐतबार कर के
भटका किए हैं तनहा कब से तेरे नगर में

आये गये हज़ारों इस रास्ते से ’आनन’
तुम ही नहीं हो तन्हा इस इश्क़ के सफ़र में

-आनन्द.पाठक


शब्दार्थ
शम्स-ओ-क़मर में =चाँद सूरज में
मर्जान में ,गुहर में= मूँगे में-मोती में

[सं 30-06-19]

4 टिप्‍पणियां:

dr manoj singh ने कहा…

umda ghazal aur koi comment nahi?laholvilakuvvat.

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० मनोज जी
आप की ग़ज़लशनाशी का बहुत बहुत शुक्रिया

Akpathak

Harash Mahajan ने कहा…

Bahut hi oomda

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 हर्ष जी
सराहना के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक