बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

मुक्तक 04 D

1

जब कभी अपनी ज़ुबां वो खोलता है

झूठ ही बस झूठ हरदम  बोलता है

जानता वो झूठ क्या है और सच क्या

वो फ़िज़ां में ज़ह्र फिर क्यों घोलता है ?


:2;

कौन सा है जो ग़म दिल पे गुज़रा नहीं
बारहा टूट कर भी  हूँ   बिखरा   नहीं
अब किसे है ख़बर क्या है सूद-ओ-ज़ियाँ
इश्क़ का ये नशा है जो  उतरा नहीं

     3
दावा करते हैं वो सूरज नया निकलने का
नई दिशा में ,नई राह पर लेकर चलने का
लेकिन काली रात अभी तो ढली नहीं, साथी !
थमा नहीं है अभी सिलसिला बेटी जलने का


-आनन्द.पाठक-

1 टिप्पणी:

आशीष अवस्थी ने कहा…

सर आपको भी दीपावली त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएं , धन्यवाद !
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