रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल 65 : फिर से नए चिराग़ जलाने की बात कर

221--2121--1221---212

फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर
सोने लगे है लोग ,जगाने की बात कर

गुज़रेगा फिर यहीं से अभी कल का कारवां
अन्दाज़-ए-एहतराम बताने की बात कर

इतना है  मुश्किलों से परेशान  आदमी
गर हो सके तो हँसने हँसाने की बात कर

लाना है इन्क़लाब तो क्या सोचता है तू
ज़र्रे को आफ़ताब बनाने की बात कर

माना चिराग़ हौसलों के हैं  बुझे हुए
माचिस कहीं से ढूँढ के लाने की बात कर

तुझसे ख़फ़ा हूँ ,ज़िन्दगी ! तू जानती भी है
अब आ भी जा कि मुझको मनाने की बात कर

’आनन’ जमाना हो गया ख़ुद से जुदा हुए
यूँ भी कभी तो भूल से आने की बात कर

-आनन्द.पाठक

[सं 30-06-19]

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

बढ़िया लगी ग़ज़ल...