मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 463[37-जी] :तुम मेरी इयादत क्या करते

 ग़ज़ल 463[37-जी] : तुम मेरी इयादत क्या करते

221---1222---112/22

तुम मेरी इयादत क्या करते
बातिल हो, मुहब्बत क्या करते

माना कि हमारे तुम न हुए
दुनिया से शिकायत क्या करते

अपने न हुए जो अपने थे 
ग़ैरों की हिमायत क्या करते

हर  शै में तुम्हारा अक्स निहाँ
हम शौक़-ए-जियारत क्या करते

यह हुस्न तुम्हारा ला सानी
हम इसकी क़िताबत क्या करते।

जब सौंप दिया खुद को हमने
फिर अपनी हिफ़ाज़त क्या करते

’आनन’ को नहीं समझा तुम ने
हम और वज़ाहत क्या करते ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-