मुक्तक 023
:1:
मन से मैने तुमको
बस अपना माना है
बस अपना माना है
मैं हूँ तेरी ’राधा’
तू मेरा ’कान्हा’ है ।
तू मेरा ’कान्हा’ है ।
:2:
रंग अबीर गुलाल लगाए
होली के हैं शुभ दिन आए
भूल सभी रंजिश की बातें
दिल मस्ती में झूमे गाए ।
मुक्तक 023
:1:
ग़ज़ल 464[38-जी] : लहज़े में लताफ़त है---
221---1222 // 221---1222
अनुभूतियाँ 193/80
[ स्व0] कवि धूमिल जी की प्रेरणा से, क्षमा याचना सहित ]---
ग़ज़ल 463[37-जी] : तुम मेरी इयादत क्या करते
221---1222---112/22
बह्र-ए-हज़ज मुसद्दसअख़रब अब्तर