गुरुवार, 2 जुलाई 2009

एक ग़ज़ल 06 : ज़माने की अगर हम....

मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन
1222----------1222---------1222------1222
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
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एक ग़ज़ल

ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते
न होती आग दिल में तो कभी के मर गए हो्ते


नहीं हम ज़ब्त करते जो सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त
तो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते


मेरे नायाब थे आँसू, वो गौहर थे इन आँखों के
छुपा कर जो नहीं रखता ,अभी तक झर गए होते


हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता
यकीनन उनकी आँखों में भी आँसू भर गए होते


अना की क़ैद ना होती ,ये दिल मगरूर ना होता
तो कूचे से तुम्हारे हम झुका कर सर गए  होते


अगर बुतख़ाने से पहले ये मयख़ाना नहीं मिलता
सुकूँ दिल को कहाँ मिलता कि किसके दर गए होते ?


सभी की मंज़िलें अपनी ,जुदा राहें यहाँ  ’आनन’
किसी भी राह से जाते तुम्हारे घर गए होते



--आनन्द.पाठक-

[सं 126-07-20]

5 टिप्‍पणियां:

M Verma ने कहा…

बेहतरीन गज़ल.
किसी भी रास्ते जाते तुम्हारे घर गए होते
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वाह क्या ज़ज़्बात है

श्रद्धा जैन ने कहा…

हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता

यकीनन उनकी आँखों में bhi आँसू भर गए होते

bahut hi sunder sher kaha hai

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० श्रद्धा जी
मूल पाठ में ’भी’ शब्द था परन्तु टाइपिंग में भूल वश छूट गया था
आप ने इंगित किया बहुत -बहुत धन्यवाद
ग़ज़ल की सराहना के लिए एक बार पुन:...
सादर
-आनन्द

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० वर्मा जी
ग़ज़ल की सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द

Pramendra Pratap Singh ने कहा…

उम्‍दा गज़ल, गज़ल का पारखी नही हूँ किन्‍तु पढ कर अच्‍छा लगा।