रविवार, 17 जनवरी 2010

एक ग़ज़ल 09 :आंधियों से न कोई गिला कीजिए ...

बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
212--------212-----------212-----212
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एक ग़ज़ल

आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए

सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएंगे
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए

दर्द-ए-जानां भी है,रंज-ए-दौरां भी है
क्या ज़रूरी है ख़ुद फ़ैसला कीजिए

मैं वफ़ा की दुहाई तो देता नहीं
आप जितनी भी चाहे जफ़ा कीजिए

हमवतन आप हैं ,हमज़बां आप हैं
दो दिलों में न यूँ फ़ासला कीजिए

आप आएँ न आएँ अलग बात है
पर मिलन का भरम तो रखा कीजिए

आप गै़रों में  इतने न मस्रूफ़ हों
आप ’आनन’ से भी तो मिला कीजिए

-आनन्द.पाठक -

[सं 19-05-18]

10 टिप्‍पणियां:

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

45बहुत खूब आनंद जी एक बेहतरीन गजल मै तो आप का नियमित पाठक हूँ बस सिकायत है आप से एक
आप गै़रों से इतने जो मस्रूफ़ हैं
काश !’प्रवीण ’ से भी मिला कीजिए
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

Arun sathi ने कहा…

wah.wah. bahut achcha.

"अर्श" ने कहा…

gazal pasand aayee ... badhaayee iske liye



arsh

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए

सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएगी
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए

wah wah behatareen lajawaab.

Unknown ने कहा…

वाह !वाह !

बहुत खूब !

बधाई !

Aravind Pandey ने कहा…

rochak aur sundar

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए ..

सार्थक लिखा है ....... दिल की आस नही बुझनी चाहिए ....... गम का अंधेरा तो आएगा उसे आने दें ...

Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak " ने कहा…

लो, हमने तो अपनी ट्टिपणी वहीं मेल पर ही कर दी.....और संजो कर भी नहीं रक्खी.... आनन्द नाराज न हों... रचना अच्छी है.

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० दिगम्बर जी/साधक जी
उत्साह वर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द.पाठक

PK SWAMI ने कहा…

aik achhee ghazal par mubaarakbaad qabool karen.

PK Swami