शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 12



:1:

दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:


ये इश्क़ सदाकत है

खेल नहीं , साहिब !
इक तर्ज़-ए-इबादत है

:3:


बस एक झलक पाना

मा’नी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:


अपनी पहचान नहीं

ढूँढ रहा बाहर
भीतर का ध्यान नहीं

:5:


जब तक मैं हूँ ,तुम हो

कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो

-आनन्द.पाठक

[सं 09-06-18]

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