रविवार, 6 दिसंबर 2015

चन्द माहिया ; क़िस्त 023

चन्द माहिया : क़िस्त 023 ओके

:1:
रिश्तों की तिजारत में
ढूँढ रहे हो क्या
इस दौर-ए-रवायत में

:2:
क्या वस्ल की रातें थीं
और न था कोई
हम तुम थे, बातें थीं

:3:
कुर्सी से रहा चिपका
कैसे मैं जानू
ये ख़ून बहा किसका


:4:
अच्छा न बुरा जाना
दिल ने कहा जितना
 उतना ही सही माना

:5:
वो आग लगाते हैं
फ़र्ज़ मगर अपना
हम आग बुझाते हैं


-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181



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