ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---
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मुक़ाबिल सच के होते ही वो घबराने लगे हैं ।
अगर मैं सच कहूँ तो उनको अफ़साने लगे हैं ।
पले गमलों के ये पौधे चलेंगे धूप में क्या !
ज़रा सी धूप होते ही ये मुरझाने ल्गे हैं ।
गया मौसम, गई ख़ुशबू, गई रौनक चमन की
जो अपने लोग थे अब दूर वो जाने लगे है ।
किनारे बैठ कर कुछ लोग बस बातें बनाते
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।
न दुनिया की ख़बर उनको, नहीं अपनी ख़बर हो
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।
न दुनिया की ख़बर उनको, नहीं अपनी ख़बर हो
ज़माने को वही सब लोग दीवाने लगे हैं ।
परिंदो को कहाँ फ़ुरसत कि मुड़ कर फिर वो देखें
पुराने शाख, आँगन, पेड़ बेगाने लगे हैं ।
मुहब्बत को समझते जो बहुत आसान ’आनन’
निभाने पर जो आती बात कतराने लगे हैं ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-