बुधवार, 16 दिसंबर 2015
गुरुवार, 10 दिसंबर 2015
चन्द माहिया : क़िस्त 24
माहिया : क़िस्त 24 ओके
:1:
ये इश्क़, वफ़ा,क़समें
:1:
ये इश्क़, वफ़ा,क़समें
सुनने में आसाँ
मुश्किल है बहुत रस्में
:2:
दिल क्या चाहे जानो
मैं न बुरा मानू
तुम भी न बुरा मानो
:3:
सच कितनी हसीं हो तुम
चाँद मैं क्या देखूं
ख़ुद माहजबीं हो तुम
:4:
जाड़े की धूप सी तुम
फूल पे ज्यों शबनम
लगती हो रूपसी ,तुम !
:5:
भींगा न मेरा आंचल
लौट गए घर से
बरसे ही बिना बादल
-आनन्द पाठक
[सं12-06-18]
:2:
दिल क्या चाहे जानो
मैं न बुरा मानू
तुम भी न बुरा मानो
:3:
सच कितनी हसीं हो तुम
चाँद मैं क्या देखूं
ख़ुद माहजबीं हो तुम
:4:
जाड़े की धूप सी तुम
फूल पे ज्यों शबनम
लगती हो रूपसी ,तुम !
:5:
भींगा न मेरा आंचल
लौट गए घर से
बरसे ही बिना बादल
-आनन्द पाठक
[सं12-06-18]
रविवार, 6 दिसंबर 2015
चन्द माहिया ; क़िस्त 23
चन्द माहिया : क़िस्त 23 ओके
:1:
रिश्तों की तिजारत में
ढूँढ रहे हो क्या
इस दौर-ए-रवायत में
:2:
क्या वस्ल की रातें थीं
और न था कोई
हम तुम थे, बातें थीं
:3:
:3:
कुर्सी से रहा चिपका
कैसे मैं जानू
कैसे मैं जानू
ये ख़ून बहा किसका
:4:
अच्छा न बुरा जाना
दिल ने कहा जितना
उतना ही सही माना
:5:
वो आग लगाते हैं
फ़र्ज़ मगर अपना
हम आग बुझाते हैं
-आनन्द.पाठक-
[सं 12-06-18]
:4:
अच्छा न बुरा जाना
दिल ने कहा जितना
उतना ही सही माना
:5:
वो आग लगाते हैं
फ़र्ज़ मगर अपना
हम आग बुझाते हैं
-आनन्द.पाठक-
[सं 12-06-18]
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