शुक्रवार, 22 मई 2020

ग़ज़ल 146 : क़ातिल के हक़ में

बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु---्फ़ाअ’लातु---मफ़ाईलु-- फ़ाअ’लुन
221---------2121---------1221-------2 1 2

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में ---

क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए
अंधे  भी   चश्मदीद   गवाही   में  आ गए

तिनका छुपा हुआ  है जो  दाढ़ी  में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई  मे आ गए

कुर्सी का ये असर है कि जादूगरी कहें
जो राहज़न थे  राहनुमाई में  आ गए

अच्छे दिनों के ख़्वाब थे आँखों में पल रहे
आई वबा तो दौर-ए- तबाही में आ गए

मुट्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो सल्तनत की पुश्तपनाही में आ गए

बस्ती जला के सेंक सियासत की रोटियाँ
मरहम लिए वो रस्म निबाही में आ गए

ऐ राहबर ! क्या ख़ाक तेरी रहबरी रही
हम रोशनी में थे कि सियाही में आ गए

’आनन’ तू खुशनसीब है पगड़ी तो सर पे है
वरना तो लोग बेच कमाई में आ गए

-आनन्द.पाठक-

वबा = महामरी
पुश्तपनाही = पॄष्ठ-पोषण,हिमायत
सियाही में = अँधेरे में
मरहम     = मलहम

1 टिप्पणी:

Meena Bhardwaj ने कहा…

अच्छे दिनों के ख़्वाब थे आँखों में पल रहे
आई वबा तो दौर-ए- तबाही में आ गए
बहुत खूब ...,
बेहतरीन ग़ज़ल ।