गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल 342 [18F] : यार के कूचे में जाना कब मना है !

 ग़ज़ल 342[18F]

2122---2122---2122


यार के कूचे में जाना कब मना है !
दर पे उसके सर झुकाना कब मना है !

मंज़िलें तो ख़ुद नहीं आएँगी  चल कर
रास्ता अपना बनाना कब मना है !

प्यास चातक की भला कब बुझ सकी है
तिशनगी लब पर सजाना कब मना है !

रोकती हैं जो हवा को,रोशनी को-
उन दीवारों को गिराना कम मना है !

ज़िंदगी बोझिल, सफ़र भारी लगे तो
प्यार के नग्में सुनाना कब मना है !

ज़िंदगी है तो सदा ग़म साथ होंगे
पर ख़ुशी के गीत गाना कब मना है !

जो अभी हैं इश्क़ में नौ-मश्क ’आनन’
हौसला उनका बढ़ाना कब मना है !


-आनन्द.पाठक-

सं 28-06-24

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