मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल 343 [19F]: आकर जो पूछ लेते--

 ग़ज़ल 343[19F]

221---2122  // 221---2122


आकर जो पूछ लेते, क्या हाल है हमारा ?
ताउम्र दिल ये करता ,सद शुक्रिया तुम्हारा ।

किस शोख़ से अदा से, नाज़ुक़ सी उँगलियों से
तुमने छुआ था मुझको, महका बदन था सारा ।

होती अगर न तेरी रहम-ओ-करम, इनायत
तूफ़ाँ में कश्तियों को मिलता कहाँ किनारा !

दैर-ओ-हरम की राहें , मैं बीच में खड़ा हूँ
साक़ी ने मैकदे से हँस कर मुझे पुकारा ।

दिलकश भरा नज़ारा, मंज़र भी ख़ुशनुमा हो
जिसमें न अक्स तेरा ,किस काम का नज़ारा ।

जब साँस डूबती थी, देखी झलक तुम्हारी
गोया कि डूबते को तिनके का हो सहारा ।

मैं ख़ुद में गुम हुआ हूँ , ख़ुद को ही ढूंढता हूँ
मुद्दत हुई अब आनन’, ख़ुद को नहीं निहारा !


-आनन्द.पाठक---

सं 28-06-24


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