सोमवार, 15 जनवरी 2024

ग़ज़ल 353[29F] : ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है--

ग़ज़ल 353 [29F]

2122---2122---212


ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है
आदमी का सोचना कुछ  और है ।

बात वाइज़ की सही अपनी जगह
दरहक़ीकत सामना कुछ और है ।

तुम भले ही जो कहो, हँस कर कहो
जर्द चेहरा कह रहा कुछ  और है।

क्यों तुम्हे दिखता नहीं चेहरे का सच
क्या तुम्हारा आइना कुछ और है ?

दिल कहे जब भी कहे तो सच कहे
लग रहा तुमने सुना कुछ और है ।

वस्ल के पहले ख़याल-ए-वस्ल हो
फिर तड़पने का मज़ा कुछ और है।

इश्क़ का मतलब नहीं 'आनन' हवस
इश्क़ का तो रास्ता कुछ और है ।


-आनन्द.पाठक-

सं 29-06-24


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