[ स्व0] कवि धूमिल जी की प्रेरणा से और क्षमा याचना सहित ]
कविता 031: एक आदमी सड़क पर---
एक आदमी सड़क पर
दूसरे आदमी को पीट रहा है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न पीट रहा है, न पिट रहा है
न रोक रहा है।
वह मोबाइल से *रील* बना रहा है चैन से।
मैं पूछता हूँ वह तीसरा आदमी कौन है?
समाज इस पर मौन है ।
दूसरे आदमी को पीट रहा है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न पीट रहा है, न पिट रहा है
न रोक रहा है।
वह मोबाइल से *रील* बना रहा है चैन से।
मैं पूछता हूँ वह तीसरा आदमी कौन है?
समाज इस पर मौन है ।
-आनन्द.पाठक-
आ0 [स्व0] धूमिल जी की मूल कविता पाठको के अवलोकनार्थ यहाँ लगा रहा हूँ
आप भी आनन्द उठाएँ
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
आप भी आनन्द उठाएँ
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
--धूमिल -
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