गुरुवार, 17 अक्तूबर 2019

ग़ज़ल 128 : इश्क़ करना


212---212---22
फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़अ’लुन
बह्र-ए-मुत्दारिक मुसद्दस सालिम मक़्तूअ’
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इश्क़ करना ख़ता क्यों है ?
इश्क़ है तो छुपा  क्यों है ?

जाविदाँ हुस्न है  उनका
इश्क़ फिर नारवा क्यों है?

बाब-ए-दिल गर खुला है तो
लौट आती सदा क्यों है ?

ज़िन्दगी बस बता मुझको
बेसबब तू ख़फ़ा क्यों है ?

आब-ओ-गिल से बने हम तुम
रंग अपना जुदा क्यों है ?

इश्क़ भी क्या अजब शै है
रोज़ लगता नया क्यों  है ?

रस्म-ए-उल्फ़त निभाता हूँ
फिर भी ’आनन’ बुरा क्यों है ?

-आनन्द.पाठक-
प्र

शब्दार्थ
बाब-ए-दिल = हृदय पटल
जाविदाँ हुस्न = अनश्वर सौन्दर्य
नारवा       = जो रवा न हो ,अनुचित
आब-ओ-गिल से = पानी-मिट्टी से

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