शनिवार, 21 दिसंबर 2019

ग़ज़ल 136 : तुम्हारे हुस्न ्से--

ग़ज़ल 136

1222---1222---1222---1222

तुम्हारे हुस्न से जलतीं हैं ,कुछ हूरें  भी जन्नत में,
ये रश्क़-ए-माह-ए-कामिल है,फ़लक जलता अदावत में ।

तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर ?
ज़ियादा कम का मसला तो नहीं होता है उल्फ़त में ।

पहाडों से चली नदियाँ बना कर रास्ता अपना ,
तो डरना क्या  ,फ़ना होना है जब राह-ए-मुहब्बत में ।

वही आदत पुरानी है तुम्हारी आज तक ,जानम !
गँवाया वक़्त मिलने का ,गिला शिकवा शिकायत में ।

चिराग़ों को मिला करती हवाओं से सदा धमकी ,
नहीं डरते, नहीं बुझते, ये शामिल उनकी आदत में ।

उन्हें भी रोशनी देगी जो थक कर हार कर बैठे ,
मेरा जब ज़िक्र आयेगा ज़माने की हिकायत में ।

जहाँ सर झुक गया ’आनन’ वहीं काबा,वहीं काशी ,
वो खुद ही आएँगे चलकर बड़ी ताक़त मुहब्बत में ।

-आनन्द.पाठक-

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