मंगलवार, 8 नवंबर 2022

ग़ज़ल 283[48इ] : आप से है एक रिश्ता जाविदाँ

 ग़ज़ल 283[48इ]


2122---2122---212


आप से है एक रिश्ता जाविदाँ

एक क़तरा और बह्र-ए-बेकराँ


राजमहलों की हकीकत एक सी

वक़्त के हाथों मिटा नाम-ओ-निशाँ


छोड़ कर जाना तेरी महफिल, हमे

वक़्त सबका है मुक़र्रर जब यहाँ


और भी दुनिया में हैं तेरी तरह

एक तू ही तो नहीं है सरगिराँ  


चाहतों में ही उलझ कर रह गई

हर बशर की नामुकम्मल दास्ताँ


संग-ए-दिल भी चीख उठता देख कर

जब उजड़ता है किसी का आशियाँ


वह ज़माना अब कहाँ ’आनन’ रहा

ज़ाँ-ब लब तक जब निभाते थे ज़बाँ


-आनन्द.पाठक- 


जाविदाँ     = नित्य, शाश्वत,अनश्वर

बह्र-ए-बेकराँ = असीम सागर

सरगिराँ         =नाख़ुश ,अप्रसन्न  

ज़ाँ ब लब तक = अन्तिम अन्तिम समय तक [ मृत्यु काल तक]  

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