गुरुवार, 14 सितंबर 2023

ग़ज़ल 340 [16F]: क्यों अँधेरों में जीते हो मरते हो तुम

 ग़ज़ल  340[16F]

212---212---212---212


क्यों अँधेरों में जीते हो मरते हो तुम
रोशनी की नहीं बात करते हो तुम ।

रंग चेहरे का उड़ता क़दम हर क़दम
सच की गलियों से जब भी गुज़रते हो तुम

कौन तुम पर भरोसा करे ? क्यों करे?
जब कि हर बात से ही मुकरते हो तुम

राह सच की अलग, झूठ की है अलग
राह ए हक  पर भला कब ठहरते हो तुम ?

वो बड़े लोग हैं, उनकी दुनिया अलग
बेसबब क्यों नकल उनकी करते हो तुम ?

वक़्त आने पे लेना कड़ा फ़ैसला
उनके तेवर से काहे को डरते हो तुम ?

तुमको उड़ना था ’आनन; नहीं उड़ सके
तो परिंदो के पर क्यों कतरते हो तुम ?


-- आनन्द,पाठक--

सं 28-06-24


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