मंगलवार, 14 जनवरी 2025

अनुभूतियाँ 163/50

 अनुभूतियाँ 163/50

649
कभी प्रेम का ज्वार उठा है
कभी दर्द के बादल छाए ।
जीवन भर मैने जीवन को
मिलन-विरह के गीत सुनाए ।

650
चाहे जितना अँधियारा हो
एक रोशनी मन के अन्दर
सतत जला करती रहती है
राह दिखाती रहती अकसर

651
तीर कमान लिए हाथों में
काल, व्याध बन बैठा छुप कर
इक दिन तो जद में आना है
कब तक रह पाओगे बच कर।

652
साँस साँस पर कर्ज उसी का
वही साँस में  घुला हुआ है ।
 मन रहता आभारी उसका
सतगुण से जो धुला हुआ है ।
-आनन्द.पाठक-

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