शनिवार, 15 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 56

चन्द माहिया  :क़िस्त 56

:1:
 कैसी  ये माया है
तन तो है अपना
मन तुझ में समाया है

:2:
इस फ़ानी हस्ती पर
दाँव लगाए ज्यों
कागज़ की कश्ती पर

:3:
ये कैसा रिश्ता है
ओझल है फिर भी
दिल रमता रहता है

:4:
बेचैन बहुत है दिल
कब तक मैं तड़पूं
अब तो बस आकर मिल

:5:
अन्दर की सब बातें 
लाख छुपाओ तुम
कह देती हैं आँखें


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 8 सितंबर 2018

ग़ज़ल 101[49] : झूठ का जब धुआँ --


एक ग़ज़ल :
212---212---212---212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
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झूठ का  ये धुआँ जब घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईने को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइने से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-

[सं0 25 -09-18]

सोमवार, 3 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 53

चन्द माहिया  :क़िस्त 53

:1:
 क़िस्मत की बातें हैं 
कुछ को ग़म ही ग़म
कुछ को  सौग़ातें  हैं

:2:
कब किसने माना है
आज नहीं तो कल
सब छोड़ के जाना है

:3:
कब तक भागूँ मन से
देख रहा कोई
छुप छुप कर चिलमन से

:4:
कब दुख ही दुख रहता
किसके जीवन में
बस सुख ही सुख रहता ?

5
लगनी है तो ,लगती
आग मुहब्बत की
लगने पे नही बुझती


-आनन्द.पाठक-