मंगलवार, 21 जनवरी 2014

एक ग़ज़ल 56 : ये बाद-ए-सबा है..


122--122--122---122

ये बाद-ए-सबा है ,भरी ताज़गी है
फ़ज़ा में अजब कैसी दीवानगी है

निज़ाम-ए-चमन जो बदलने चला तो
क्यूँ अहल-ए-सियासत को नाराज़गी है

वो सपने दिखाता ,है बातें  बनाता
ख़यालात में उस की बेचारगी  है

बदल दे ज़माने की रस्म-ओ-रवायत
अभी सोच में तेरी पाकीज़गी है

दुआयें करो ये तलातुम से उबरे
गो मौजों की कश्ती  से रंजीदगी है

वो वादे निभाता, निभाता भी कैसे ?
वफ़ा में कहाँ अब रही पुख़्तगी है  ?

हो दीवार-ए-ज़िन्दां से क्यों ख़ौफ़ ’आनन’
अगर तेरी ताक़त तेरी सादगी है


दीवार-ए-ज़िन्दां = क़ैदख़ाने की दीवार

-आनन्द.पाठक-
[सं 30-06-19]

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