शनिवार, 22 अक्तूबर 2022

मुक्तक 05E : दीपावली पर

 कुछ मुक्तक 05E : दीपावली पर


:1:

पर्व दीपावली का मनाते चलें

प्यार सबके दिलों में जगाते चलें

ये अँधेरे हैं इतने घने भी नहीं

हौसलों से दि्ये हम जलाते चलें


:2:

आग नफ़रत की अपनी मिटा तो सही

तीरगी अपने दिल की हटा तो सही

इन चराग़ों की जलती हुई रोशनी

राह दुनिया को मिल कर दिखा तो सही


:3:

कर के कितने जतन प्रेम के रंग भर

अल्पनाएँ सजा कर खड़ी द्वार पर

एक सजनी जला कर दिया साध का

राह ’साजन’ की तकती रही रात भर


:4:

प्रीति के स्नेह से प्राण-बाती जले

दो दिये जल रहे हैं गगन के तले

लिख रहें हैं कहानी नए दौर की

हाथ में हाथ डाले सफ़र पर चले 


:5:

घर के आँगन में पहले जलाना दिये

फिर मुँडेरों पे उनको  सजाना. प्रिये !

राह सबको दिखाते रहें दीप ये-

हर समय रोशनी का ख़जाना लिए ।


-आनन्द पाठक-

कोई टिप्पणी नहीं: