सोमवार, 11 जुलाई 2022

ग़ज़ल 244 [09E] : वक़्त देता, वक़्त आने पर सज़ा है

 ग़ज़ल 244 [09E]


2122---2122---2122


वक़्त देता, वक़्त आने पर सज़ा है
कौन इसकी मार से अबतक बचा है 

रात-दिन शहनाइयाँ बजती जहाँ थीं
ख़ाक में ऎवान अब उनका पता है

तू जिसे अपना समझता, है न अपना
आदमी में ’आदमीयत’ लापता है

दिल कहीं, सजदा कहीं, है दर किसी का
यह दिखावा है ,छलावा और क्या है 

इज्तराब-ए-दिल में कितनी तिश्नगी है
वो पस-ए-पर्दा  बख़ूबी जानता है  

क्या कभी ढूँढा है उसको दिल के अन्दर
बारहा ,बाहर जिसे तू  ढूँढता  है

ज़िंदगी क्या है ! न इतना सोच ’आनन’
इशरत-ओ-ग़म से गुज़रता रास्ता है


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

ऎवान                = महल , प्रासाद

इज़्तराब-ए-दिल  =बेचैन दिल

तिश्नगी          = प्यास

पस-ए-पर्दा         = परदे के पीछॆ से

बारहा = बार बार 

इशरत-ओ-ग़म से     = सुख -दुख से


शनिवार, 9 जुलाई 2022

ग़ज़ल 243 [08E] : नई जब राह पर तू चल--

 ग़ज़ल 243


1222---1222---1222---1222


नई जब राह पर तू चल तो नक़्श-ए-पा बना के चल,
क़दम हिम्मत से रखता चल, हमेशा सर उठा के चल ।

बहुत से लोग ऐसे हैं ,जो काँटे ही बिछाते हैं
अगर मुमकिन हो जो तुझसे तो गुलशन को सजा के चल 

डराते है तुझे वो बारहा बन क़ौम के ’लीडर’
अगर ईमान है दिल में तो फिर नज़रें  मिला के चल

किसी का सर क़लम करना, सिखाता कौन है तुझको ?
अँधेरों से निकल कर आ, उजाले में तू आ के चल

तुझे ख़ुद सोचना होगा ग़लत क्या है सही क्या है
फ़रेबी रहनुमाओं से ज़रा दामन बचा के चल

न समझें है ,न समझेंगे , वो अन्धे बन गए क़स्दन
मशाल इन्सानियत की ले क़दम आगे बढ़ा के चल

सफ़र कितना भी हो मुशकिल, लगेगा ख़ुशनुमा ’आनन’
किसी को हमसफ़र, हमराज़ तो अपना बना के चल


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

क़स्दन = जानबूझ कर

शनिवार, 2 जुलाई 2022

ग़ज़ल 242(07E) : कटी उम्र उनको बुलाते बुलाते

 ग़ज़ल 242 [07E]


122---122---122---122


कटी उम्र उनको बुलाते बुलाते
जमाना लगेगा उन्हें आते आते

न जाने झिझक कौन सी उनके मन में
इधर आते आते, ठहर क्यों हैं जाते ?

हक़ीक़त है क्या? यह पता चल तो जाता
कभी अपने रुख से वो परदा हटाते

अँधेरों में तुमको नई राह दिखती
चिराग़-ए-मुहब्बत अगर तुम जलाते

परिंदो की क्या ख़ुशनुमा ज़िंदगी है
जहाँ दिल किया जब वहीं उड़ के जाते

ख़िलौना था कच्चा इसे टूटना था
नई बात क्या थी कि आँसू बहाते

ये माना कि दुनिया फ़रेबी है ’आनन’
इसी में है रहना, कहाँ और जाते 


-आनन्द.पाठक-