फ़िर कहीं दूर आँगन से उठता धुआँ
आज फिर एक पापा कि ’मुनिया’ जली।
दो ह्रदय के अधूरे मिलन जल गए
दो नयन के सजीले सपन जल गए
प्यार पूजा से क्यों वासना हो गई
जो दिए थे वचन, वो वचन
जल गए।
आदमी ने जलाया उसे आज तक
एक बाबुल की प्यारी सी गुड़िया जली ।
मांग सिन्दूर का रंग पीला हुआ
आदमी इस तरह क्यूँ हठीला हुआ
फूल आँचल में भर ना सका प्यार के
प्यार जो भी दिया वो कँटीला
हुआ
आदमी के सड़े सोच की क्या कहें
एक नारी की प्यारी-सी दुनिया
जली
क्या हुए वो शपथ सात फेरे हुए ?
यह सुबह ही सुबह क्यों अँधेरे हुए
हाथ अग्नि-शलाका लिए आदमी
घर के आँगन की 'तुलसी' को घेरे हुए
थाल पूजा की थी क्यूँ जहर हो गई
एक सिंदूर की काठ डिबिया जली ।
आँख मे इक सजा नेह कजरा जला
वेणियों में गुँधा प्यार गजरा जला
थी किसी की कलाई की राखी, जली
एक ममता जली स्नेह अँचरा जला
जो सजे फूल जूड़ा में थे, जल गए
पाँव मे एक पावन थी बिछिया जली।
ना ही ’ऊषा’ जली ना ’मनीषा’ जली
बस जले आदमी के ही चेहरे जले
बात करते हैं इंसानियत की वही
जिनके
दिल में सड़ी सोच के आबले
एक दुल्हन के नैहर की चुनरी जली
माँग-टीका
जला एक ’नथिया’ जली ।
फ़िर कहीं दूर आँगन से........
सं 28-08-25
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