शुक्रवार, 9 मार्च 2012

गीत 038 :काहे नS रंगवा लगउलु हो गोरिया


गीत 038 :काहे नS रंगवा लगउलु हो गोरिया ...काहे नS रंगवा लगउलु ?


अपने नS अईलु न हमके बोलऊलु ,’कजरी’ के हाथे नS चिठिया पठऊलु
होली में मनवा जोहत रहS गईलस. केकरा से जा के तू रंगवा लगऊलु
रंगवा लगऊलु......तू रंगवा लगऊलु...
काहे केS मुँहवा फुलऊलु संवरिया ? काहे केS मुँहवा बनऊलु ?


रामS के संग होली सीता जी खेललीं ,’राधा जी खेललीं तS कृश्ना से खेललीं
होली के मस्ती में डूबलैं सब मनई नS अईलु तS तोहरे फ़ोटुए से खेललीं
फोटुए से खेललीं... हो फ़ोटुए से खेललीं....
अरे ! केकराS से चुनरी रंगऊलु ?, सँवरिया ! केकरा से चुनरी रंगऊलु ?


’रमनथवा’ खेललस ’रमरतिया’ के संगे, ’मनतोरनी ’ खेललस संघतिया के संगे
दुनिया नS कहलस कछु होली के दिनवा ,खेललस ’जमुनवा’ ’सुरसतिया’ के संगे
सुरसतिया के संगे.....सुर सतिया के संगे....
केकरा केS डर से तू बाहर नS अईलु ,नS अंगवा से अंगवा लगउलु
काहें गोड़धरिया करऊलु संवरिया.....


काहें गोड़धरिया करऊलु.?..............काहें न रंगवा लगऊलु ?


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181



बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

गीत 037: मुझसे मेरे गीतों का ....


गीत 037 : मुझसे मेरे गीतों का ,प्रिय ! अर्थ न पूछो

मुझसे मेरे गीतों का ,प्रिय ! अर्थ न पूछो
कहाँ कहाँ से हमें मिलें हैं, दर्द न पूछो


जब भी मेरे दर्दों को विस्तार मिला है
तब जाकर इन गीतों को आकार मिला है
जब शब्दों को अपनी आहों में ढाला हूँ
तब जाकर इन गीतों को आवाज़ मिला है

जीवन की अधलिखी किताबों के पन्नों पर
किसने लिखे हैं पीड़ा के ये सर्ग ,न पूछो !


स्वप्नों में कुछ रूप तुम्हारा मैं गढ़ता हूँ
एक मिलन की आस लिए आगे बढ़ता हूँ
दुनिया ने कब मेरे सच को सच माना है?
अपनी राम कहानी मैं ख़ुद ही पढ़ता हूँ

जिन गीतों को सुन कर आंसू ढुलक गए हों
उन गीतों के क्या क्या थे सन्दर्भ , न पूछो


करनी थी दो बातें तुमसे ,कर न सके थे
उभरे थे सौ बार अधर पे ,कह न सके थे
कुछ तेरी रुस्वाई का डर ,कुछ अपना भी
छलके थे दो बूँद नयन में ,बह न सके थे

तुम कभी इधर आना तो ख़ुद ही पढ़ लेना
पथराई आंखों के क्या थे शर्त , न पूछो
मुझसे मेरे गीतों का .....


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181




शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

गीत 036 : दीन धरम -और- सच की बातें?

गीत 036 : 


दीन धरम औ’ सच की बातें ? किस युग की बातें करते हो?
’सतयुग’ बीते सदियाँ गुजरी, तुम जिसकी बातें करते हो .


मैंने तो निश्छल समझा था, भेज दिया संसद में चुन के
मुझको क्या मालूम कि तुम भी बह जाओगे जैसे तिनके
सच पर ’ग्रहण’ लगाने वाले ’राहू-केतू ’मयख़ाने में
’उग्रह’ कभी न होने देंगे जब तक सत्ता वश में उनके


बेच दिया जब ख़ुद को तुमने ’सूटकेस’ की धन-दौलत पर
आदर्शों के अवमूल्यन की फिर तुम क्यों बातें करते हो ?


हाथ मिलाने वाले जो हैं  ’गुणा-भाग’ कर हाथ मिलाते
उनको जितनी रही ज़रूरत, उतना ही बस साथ निभाते
रिश्तों में जो महक छुपी है ,’कम्पूटर’ से क्या पहचानो
आभासी दुनिया में रहते ,फिर तुम अपनी  साख़  बताते


तौल दिया रिश्तों को तुमने ’हानि-लाभ’ के दो पलड़ों पर
अपनों के बेगानेपन पर, फिर तुम क्यों आहें भरते हो ?


बात जहाँ पे तय होनी थी ,कलम बड़ी तलवारों से
’मुझे चाहिए आज़ादी बस’- उछ्ल रहे थें जयकारो से
जो सरकारी अनुदानों पर पले हुए सुविधा रोगी थे
समर शुरू होने से पहले खिसक लिए पिछली द्वारों से

जब अपने पर आन पड़ी तो ’अगर-मगर’ कर बगल झांकते
फिर क्यों अपनी मुठ्ठी भींचे , यूँ ऊँची बातें करते हो ?


-आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181