शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 312[77इ] : चिराग़-ए-इल्म जिसका हो --

 ग़ज़ल 312


1222---1222---1222---1222


चिराग़-ए-इल्म जिसका हो, सही रस्ता दिखाता है
जहाँ होता वहीं से ख़ुद पता अपना बताता  है

शजर आँगन में, जंगल में कि मन्दिर हो कि मसज़िद मे
जो तपता ख़ुद मगर औरों पे वो छाया लुटाता है

समन्दर है तो क़तरा है, न हो क़तरा समन्दर क्या
ये रिश्ता दिल हमेशा ही निभाया है निभाता है

नज़र आता नहीं फिर भी तसव्वुर में है वह रहता
बहस मैं क्या करूँ इस पर नज़र आता, न आता है

हवेली माल-ओ-ज़र, इशरत जो जीवन भर जुटाते हैं
यही सब छोड़ कर जाते, कभी जब वह बुलाता है

इनायत हो अगर उनकी  तो दर्या रास्ता दे दे
करम उनका भला इन्साँ कहाँ कब जान पाता है

 जो संग-ए-आस्ताँ उनका हवा छूकर इधर आती 
मुकद्दस मान कर ’आनन’ ये अपना सर झुकाता है


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

शजर = पेड़

माल-ओ-ज़र इशरत = धन संपत्ति, ऐश्वर्य वैभव

संग-ए-आस्ताँ  = चौखट

मुक़द्दस =पवित्र


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 311[76इ] :दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो

 1222---1222---1222--122


एक ग़ज़ल 311 [76इ]


दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो
जो जुमले घिस चुके क्यों बारहा रटवा रहे हो

अकेले तो नहीं तुम ही जो लाए थे उजाले
यही इक बात हर मौके पे क्यों दुहरा रहे हो

दिखा कर ख़ौफ़ का  मंज़र जो लूटे हैं चमन को
उन्हीं को आज पलकों पर बिठाए जा रहे हो

अगर शामिल नहीं थे तुम गुजस्ता साजिशों में
नही है सच अगर तो किस लिए  घबरा रहे हो ?

सबूतों के लिए तुम बेसबब हो क्यों परेशाँ
खड़ा सच सामने जब है तो क्या झुठला रहे हो

ये मिट्टी का बदन है ख़ाक में मिलना है इक दिन
ये इशरत चार दिन की है तो क्यों इतरा रहे हो

तुम्हारी कैफ़ियत ’आनन’ यही है तो कहेँ क्या  
जहाँ पत्थर दिखा बस सर झुकाते जा रहे हो


-आनन्द पाठक-

ग़ज़ल 310[75इ] : हमें कब से वह शिद्दत से


ग़ज़ल 310 [75इ]

1222---1222---1222--122


हमे कब से वो शिद्दत से यही बतला रहा है
लहू के रंग कितने हैं  हमें समझा  रहा है

उसे भाता नहीं सुख चैन मेरी बस्तियों का
हवा दे कर बुझे शोलों को वो भड़का रहा है

फ़रिश्ता बन के उतरेगा न कोई आसमाँ से
बचे हैं जो उन्हें सूली चढ़ाया  जा रहा है

जो बाँटी 'रेवड़ी' उसने, दिखे बस लोग अपने
ज़माने को वह असली रंग अब दिखला रहा है

वो कर के दरजनो वादे हुआ सत्ता पे काबिज़
निभाने की जो पूछी बात तो हकला रहा है ।

इधर पानी भरा बादल तो आता है यक़ीनन
पता चलता नहीं पानी किधर बरसा रहा है

वो मीठी बात करता सामने हँस हँस कर ’आनन’
पस-ए-पर्दा वो टेढ़ी चाल चलता जा रहा है


-आनन्द.पाठक-