शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2007

दोहे 002: चुनावी दोहे

दोहे 002 : चुनावी दोहे

नेता ऐसा चाहिए, जैसे सूप सुहाय ।
चन्दा ,चन्दा गहि रहे ,पर्ची देइ उड़ाय ॥
वही नेता है सच्चा ।
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नेता जी बूझन लगे ,अब अदरक के स्वाद ।
वोट उगाने मे लगे. दे ’जुमले’  की खाद ॥
सही है हुनर आप का ।
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सत्ता जिसकी सहचरी , कुर्सी हुई रखेल ।
ऐसे  नेता घूमते , डाल कान में तेल  ॥
कौन अब क्या कर लेगा ।।
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नेता से टोपी भली ,ढँक ले सारा पाप ।
नौकरशाही अनुचरी ,आगे आगे आप ॥
यही सत्ता का सुख है ।
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वैसे छाप अँगूठ थे ,निर्वाचन के पूर्व ।
जब से मंत्री बन गए, भये ज्ञान के सूर्य ॥
आरती सभी उतारें ।
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पद पखारने आ रहें, नेता ले जयमाल ।
लगता है सखि !आ गया, नया चुनावी साल ॥
सभी मिल ढोल बजाओ ।
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नेता जी जब हो गए, लूटपाट में सिद्ध ।
चमचे भी होने लगे, शनै शनै समृद्ध ॥
चुनावी तैयारी है ।
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-आनन्द.पाठक- 'आनन’
880092 7181




बुधवार, 17 अक्टूबर 2007

दोहे 001: दुमछल्ले दोहे



दुम छल्ले दोहे  001 

झूठ बोलना हो गया, राजनीति का धर्म । 
आँखों में पानी नहीं, फिर काहे का शर्म॥
कर्म वह वही करेगा,


सामाजिक इन्साफ की, ऐसे देवें  हाँक ।
नफ़रत फैली शहर में ,गाँव  गाँव में पाँक ॥
सदा रोटी सेंकेगा ।
-

दल बदली करने लगे ,तपे तपाये लोग ।
 बात कहाँ आदर्श की,अवसरवादी योग ॥
उन्हे अब शर्म न आवै।


लोकसभा देने लगी  ,निर्वाचन की टेर ।
एक जगह जुटने लगे,कौआ -हंस-बटेर ॥
तमाशा देखन जोगू ।


’गाँधी टोपी’ पहन कर,  निर्वाचन कम्पेन ।
’डीनर’ करते ’ताज’ में, हाथ लिए 'शम्पेन॥
ग़रीबी पर बोलेगा।


 जिसने  जितनी  बेंच दी ,'टोपी' और 'जमीर ' ।
राजनीति में हो गयी , उतनी ही जागीर ॥
वही रहनुमा हमारा ।


लँगड़ा है  ’स्केट’ पर  ,अँधा लिए कमान ।
गूंगा गुंगियाता फिरे, भारत देश महान  ॥
भला भगवान करेगा।


-आनन्द.पाठक ’आनन्द-
880092 7181



गुरुवार, 16 अगस्त 2007

रिपोर्ताज़ 01: शरणम श्रीमती जी--पुस्तक परिचय

यह मेरा प्रथम व्यंग संग्रह है .इस संग्रह का प्रकाशन "अयन प्रकाशन १/२० ,मेहरौली दिल्ली ११००३० " .मूल्य १२५/-
दर्द के कई रूप होते हैं । जब समग्र दर्द एकाकार हो जाता है तो कोई आयाम नहीं रहता ,कोई रंग नहीं रहता ,आंसू बन जाता है ,फिर वह आंसू चाहे आप की आंखो से बहे या गालिब की आंखो से ,एक रंग हो जाता है । अभिव्यक्ति की शैली ,विधा मात्र के अन्तर से पीडा का मूल्यांकन कम हो उचित नहीं ।

व्यक्ति समाज की मूळ इकाई है .यह संभव नही कि समाज का परिवेश प्रभावित हो और व्यक्ति का व्यक्तित्व अप्रभावित रहे .यदि सामाजिक व्यवस्था में विकृतियाँ व्याप्त हो रहीं हो तो व्यक्ति का सोच प्रभावित होना तय है । दुषप्रभाव के प्रति आंख मूंद लेने से एक संवेदन शून्यता पैदा होती है । जब यही विरूपण की पीडा मानवीय संवेदंशीलामना व्यक्ति महसूस करता है तो प्रस्फुटित होती है एक कविता ,एक ग़ज़ल ,एक कहानी ,एक व्यंग . जन्म लेता है एक वाल्मीकि ।
व्यंग एक आईना है.यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपना रूप निहारते हैं ,संवारते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं .इन्ही सब भावनाओं से मैंनें एक अकिंचन प्रयास किया है ।
पुस्तक के सभी व्यंग को इस साईट पर लिखना संभव तो नही ,पर मैं प्रयास करूंगा कि कुछ चुनिंदा व्यंग आप के समक्ष प्रस्तुत करूं ।

इस संग्रह में २८ व्यंगों का संकलन है :-