मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

विविध 04 :फ़र्द शे’र

विविध 04: फ़र्द शे’र

[ एक समन्दर , मेरे अन्दर ] से
           
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11212---11212---11212---11212
 वो चिराग़ लेके चला तो है ,मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
 मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो     

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1222---1222---1222---1222
 तुम्हारा रास्ता तुमको मुबारक हज़रत-ए-नासेह
 अरे ! मैं रिन्द हूँ पीर-ए-मुगां है ढूँढता  मुझको
  
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11212---11212---11212---11212
मैं दरख़्त हूँ ,वो लगा गया ,मैं बड़ा हुआ ,वो चला गया
वो बसीर था जो भी ख़्वाब थे मेरी शाख़ शाख़ में जज़्ब है
                    
(एक समंदर मेरे अंदर ) --प्रकाशित
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शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

ग़ज़ल 96[41] : मिलेगा जब वो हम से

1222--1222--1222--1222 
ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

ग़ज़ल 95[44] : छुपाते ही रहे अकसर---

1222--1222---1222---1222
एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर--

छुपाते ही रहे अकसर ,जुदाई के ये चश्म-ए-नम
जमाना पूछता गर ’क्या हुआ?’ तो क्या बताते हम

मज़ा ऐसे सफ़र का क्या,उठे बस मिल गई मंज़िल
न पाँवों में पड़े छाले  ,न आँखों  में  ही अश्क-ए-ग़म

न समझे हो न समझोगे ,  ख़ुदा की  यह इनायत है
बड़ी क़िस्मत से मिलता है ,मुहब्बत में कोई हमदम

हज़ारों सूरतें मुमकिन , हज़ारों  रंग भी मुमकिन
मगर जो अक्स दिल पर है किसी से भी नहीं है कम

ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है  ,बदल जायेगा ये मौसम

नहीं देखा सुना होगा  ,जुनून-ए-इश्क़ क्या होता
कभी ’आनन’ से मिल लेना ,समझ जाओगे तुम जानम

-आनन्द.पाठक-