दोहे 012: चुनावी दोहे
निर्दल बाँधे राखिए , डोरे उन पर डार ।
ना जाने किस हौद में, अपना मुँह दें मार ॥
मोह कपट छल धूर्तता, नेता की पहचान ।
साँपन काटे बच सके , इनसे बचै न प्रान ।।
उड़न खटोला पे उड़ें, देख ग़रीबी रोय ।
जनता छप्पर पे टँगी, दर्द न पूछै कोय ।।
पीड़ित शोषित हो कहीं, आँसू पोछैं धाय ।
अगले किसी चुनाव में, वोट खिसक ना जाय ॥
एक टीस मन की यही, करती है बेचैन ।
मंत्री की कुर्सी मिले, जी में आवै चैन॥
शब्दों की बाजीगरी, नेता जी का खेल ।
वैचारिक प्रतिबद्धता, हुई हाथ की मैल ॥
देश प्रेम सेवा मदद , कुरसी के उपनाम ।
जब चुनाव जीते नहीं, अब क्या इनका काम ॥
-आनन्द.पाठक ’आनन’
880092 7181
05/26
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