गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

गीत 020 [09]:श्वेत-पत्र पर खून के छींटे...

गीत 020: श्वेत पत्र पर ख़ून के छींटे--

[ ६ दिसम्बर,किसी भी वर्ष का एक सामान्य दिन,भारतीय राजनीति का का एक खास दिन,६-दिसम्बर -१९९२ ,बाबरी मस्जिद ढहाई गई, दो दिलों के बीच नफ़रत की दीवार उठाई गई.इस दिन को कोई शौर्य दिवस के रूप में मनायेगा,कोई पुरुषार्थ दिवस के रूप में ,कोई धिक्कार दिवस के रूप में मनाएगा,कोई इसे इन्सानियत शर्मसार दिवस के रूप में मनायेगा.लाश गिन-गिन संसद की सीढ़िया चढ़ते लोग..लिब्राहम रिपोर्ट में इल्जाम सब पर ,मुजरिम कोई नही......
जले पर नमक यह कि इस घटना पर एक श्वेत-पत्र लाने की बात हुई थी....शायद .उन्हे मालूम नहीं....इतिहास के काले पन्नों से श्वेत-पत्र नहीं लिखा जाता..
अयोध्या बाबरी मस्जिद प्रकरण पर हुए दंगे पर उत्पन्न एक सहज आक्रोश.....उस समय लिखी गई एक सहज कविता....]

एक कविता  20[09] :श्वेत-पत्र पर खून की छींटे....

श्वेतपत्र पर खून की छींटे मिट न सकेंगे
चाहे जितना तथ्य जुटा लो टिक न सकेंगे

सरयू की लहरें साक्षी हैं रघुकुल रीति जहाँ की
प्राण जाए पर वचन न जाए ऐसी बात कहाँ थी
एक ईंट क्या ढही! हजारों ढही आस्था मन की
पूछ रहे हैं सिकता कण,रक्त-रंजित धार किधर की??

गिध्दों के घर शान्ति कबूतर टिक न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के .....

मन्दिर-मस्जिद नहीं बने हैं ईंटे-पत्थर-गारों से
ईश्वर कभी नहीं बँट सकता खंजर और कटारों से
मन की श्रध्दा अगर प्रबल हो,पत्थर भी शिवालय है
धर्म कभी नहीं सिंच सकता नर-रक्त की धारों से

लंगड़ी टांगे बहुत दूर तक चल न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के.....

जली बस्तियाँ ,टूटे चूल्हे ,जलती लाश तबाही देखा
निर्दोष बिलखते बच्चों को अब बोलो कौन गवाही देगा?
शब्दों के आश्वासन से तो सूनी माँग नहीं भर सकती
राखी वाले हाथ कटे हैं बोलो कौन सफ़ाई देगा ??

आरोपें और प्रत्यारोपें बिक न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के....

श्वेत-पत्र में तथ्य नहीं ,इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए
किस-किस ने मिलकर किया हमे विश्वासघात जवाब चाहिए
हम गूँगी पीढ़ी नहीं कि असमय काल-पात्र में दफ़न हो गये
छिनी अस्मिता रोटी जिनकी ,उनको भी इंसाफ़ चाहिए

बहुत पी चुके और हलाहल पी न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के छींटे....

-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181



बुधवार, 25 नवंबर 2009

एक ग़ज़ल 007 [02 A]: हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगा--

गज़ल 007  ओके
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाइलुन--मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
1222---------1222--------1222-------1222---
बह्र-ए-हजज़ मुसम्मन सालिम 
----------
एक ग़ज़ल 07[02 A] : हमें मालूम है संसद में ---

हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगा ।
वही बेबात कुछ लोगों ने हंगामा  किया  होगा ।

मकाँ  जिसके थे दस वातानुकूलित संग-ए-मरमर के
उसी ने झुग्गियों के दर्द पर भाषण दिया होगा ।

शराफ़त से, अदब से जब उसे कुछ बात रखनी थी
भरी संसद में उठ कर गालियाँ वह दे रहा होगा ।

बहस होनी जहाँ थी जब किसी गम्भीर मसले पर
वहीं संसद में ’मुर्दाबाद’ का  नारा लगा होगा ।

चले होंगे कभी चर्चे जो रोटी के, ग़रीबी  के
गिना कर आंकड़े वो सिर्फ़ सीना तानता होगा ।

कभी मण्डल-कमण्डल पर, कभी ’मस्जिद कि मन्दिर पर
इन्हीं के नाम से कोई तमाशा हो रहा होगा ।

लगा आरोप ’आनन’ पर, खड़ा है कटघरे में वह
कि शायद भूल से उसने कहीं सच कह दिया होगा ।

-आनन्द.पाठक-












रविवार, 15 नवंबर 2009

गीत 018 : सजीली साँझ का मौसम

एक गीत 018 :सजीली साँझ का मौसम

सजीली साँझ का मौसम ,रंगीली रात का मौसम

उनीदी अधखुली पलकें
कपोलों पर झुकीं अलकें
पुरानी याद का मौसम, अधूरी बात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम......

नयन में खिल रहे काजल
लहरता सुरमुई आँचल
तुम्हारे साथ का मौसम ,नई सौगात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम.....

कोई मासूम बन बैठा
कोई यूँ ही गया लूटा
दिले बर्बाद का मौसम, खुले ज़ज़्बात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम....

दबा कर होंठ के कोने
लगा दिल को मिरे छूने
बहकते राह का मौसम ,अजब हालात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम.....

-आनन्द.पाठक ’आनन’-